जैसे संस्कार वैसा जीवन
व्यक्ति की पहचान:-
कौन व्यक्ति कैसा है इसकी पहचान उसके रंगरूप जाति से नहीं, वरन उसके जीवनगत संस्कार से होती है। व्यक्ति के संस्कार ऊंचे हो तो छोटा होकर भी उच्च आदर्श को स्थापित कर जाएगा। यदि व्यक्ति संस्कार विहीन है तो उसके ऊंचे कुल में पैदा होकर भी कुलीनता पर व्यंग ही होगा।
नजरिया बदलना होगा -- सही नजरिये के लोग चमड़ी के रंग व फैशन पर ध्यान नहीं देते वे सदा गुण और संस्कारों को ही महत्व देते हैं । व्यक्ति की पहचान करनी है तो उसके संस्कारों को जानो संस्कार व्यक्ति का सही मूल्यांकन करवाता है। संस्कार जीवन की नीव है , जीवन की संस्कृति हैं यही व्यक्ति की मर्यादा और उसकी गरिमा है। संस्कारों ने व्यक्ति को सदा सुखी ही किया है । और जो संस्कारों को महत्व नहीं देता उसे अंततः पछताना ही पड़ता है ।
वर्तमान पारिवारिक समस्याएं:-
परिवारों की समस्याऐं किशोरों, युवाओं, प्रौढ़ों एवं महिलाओं से भी संबन्धित है। किशोर वर्ग के समक्ष आधुनिक शिक्षा एवं पाश्चात्य प्रभाव की समस्या है। प्रौढ़ों एवं बृद्धों को यथोचित सम्मान प्राप्त नहीं है। कॉलेजों का खुला वातावरण युवाओं को कभी-कभी अपराध एवं पतन की ओर धकेल देता है। कामकाजी महिलाओं पर दुहरा बोझ पड़ता है। फिजुल खर्चे, भोगवादी संस्कृति एवं नई विलासिता पूर्ण साम्रगी भी समस्याए उत्पन्न करती है। इन सबके विश्लेषण एवं समाधान पर गहन विचार विमर्श कर समाधान निकालना चाहिए। आज बालकों में संस्कार नहीं है ऐसा भ्रमक वातावरण बनाया जा रहा है जबकि उन्हें संस्कारित करने की जिम्मेदारी हमारी है यदि कोई भी परिवार टूटता है और बच्चा असंस्कारित होकर समाज और देश को तोड़ने जैसा कुत्सित कर्म करता है तो यह जिम्मेदारी परिवार के मुखिया की है। बालक अपने जन्म के साथ अपनी प्रकृति लेकर आता है। अत: उसका अध्ययन कर उसमें समाज के लिए उपयोगी संस्कारों का संवद्र्धन करना मुखिया का कार्य है स्वतंत्रता के बाद का कालखण्ड व्यक्तिवादी सोच कर रहा है अत:भारतीय संस्कृति को विस्मरण कर बैठे और परिवार की नहीं टूटे अपितु समाज की स्थिति भी दयनीय हो गई है। इसी कारण हम अपने सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों से दूर होते चले गए। आज जब परिवारों का संकट सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों के समझ उपस्थिति हो चला है अत: इस विषय पर व्यापक चिन्तन की आवश्यकता है।
वर्तमान परिवेश से दुखी :-
इन दिनों कुछ ऐसा ही हुआ है कि अध्यात्मिक आस्थाओं से विरत होकर मनुष्य संकीर्ण—स्वार्थो की कीचड़ में फसा पड़ा है। बाहर से कोई आदर्शवाद की बात भले कहता दीखे, भीतर से उसका क्रिया कलाप बहुत ओछा है एक दूसरे में यह प्रवृत्ति छूत की बीमारी की तरह बढ़ी और अनाचार का बोलबाला हुआ।परिणाम सामने है रोग, शोक, कलह, क्लेश, पाप, अपराध , शोषण अपहरण, छल प्रपंच की गतिविधियाँ बढ़ रही है और इन परिस्थितियों को बदलने एवं सुधारने की आवश्यकता है। मानव को प्यार करने वाले हर सजग एवं विवेकवान व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह समय की समस्याओं को समझे और व्यक्ति एवं समाज को अवनति से रोक, प्रगति के लिए जो सम्भव हो सके वह करें। विचार क्रान्ति अभियान एवं युग निर्माण योजना सजग आत्माओं की एक ऐसी ही क्रमबद्ध विचारणा तथा कार्य पद्वति है जिसके आधार पर वर्तमान शोक—संताप भरी परिस्थितियाँ बदला जाना सम्भव है।
वर्तमान समय में समाधान व निवारण:-
आज के आधुनिक समय में जहाँ चारो तरफ फैशन और पाश्चात्य संस्कृति का दौर फैल रहा हैं जिस कारण आज की युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति में इस तरह रंग चुकी हैं कि वह आध्यात्मिक ज्ञान से पूरी तरह अपरिचित हैं और इसी कारण समाज में भिन्न-भिन्न प्रकार की बुराइयाँ पनपने लगी हैं लेकिन दूसरी तरफ एकमात्र तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी ने अपने अनमोल शास्त्र अनुकूल सत्य ज्ञान से विश्व में फैली सर्व बुराईयों को जड़ से खत्म करने की मुहिम छेड़ी हैं जिसे लाखों लोगों ने अपनाकर सभी बुराईयों को छोड़कर एक स्वच्छ समाज तैयार करने का संकल्प लिया है जिसका श्रेय संत रामपाल जी महाराज जी द्वारा बताये अनमोल शास्त्र अनुकूल प्रमाणित सत्यज्ञान को जाता हैं।।
सुत दारा अरु लक्ष्मी पापी घर भी होय ।
संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोय ।।
कौन व्यक्ति कैसा है इसकी पहचान उसके रंगरूप जाति से नहीं, वरन उसके जीवनगत संस्कार से होती है। व्यक्ति के संस्कार ऊंचे हो तो छोटा होकर भी उच्च आदर्श को स्थापित कर जाएगा। यदि व्यक्ति संस्कार विहीन है तो उसके ऊंचे कुल में पैदा होकर भी कुलीनता पर व्यंग ही होगा।
नजरिया बदलना होगा -- सही नजरिये के लोग चमड़ी के रंग व फैशन पर ध्यान नहीं देते वे सदा गुण और संस्कारों को ही महत्व देते हैं । व्यक्ति की पहचान करनी है तो उसके संस्कारों को जानो संस्कार व्यक्ति का सही मूल्यांकन करवाता है। संस्कार जीवन की नीव है , जीवन की संस्कृति हैं यही व्यक्ति की मर्यादा और उसकी गरिमा है। संस्कारों ने व्यक्ति को सदा सुखी ही किया है । और जो संस्कारों को महत्व नहीं देता उसे अंततः पछताना ही पड़ता है ।
वर्तमान पारिवारिक समस्याएं:-
परिवारों की समस्याऐं किशोरों, युवाओं, प्रौढ़ों एवं महिलाओं से भी संबन्धित है। किशोर वर्ग के समक्ष आधुनिक शिक्षा एवं पाश्चात्य प्रभाव की समस्या है। प्रौढ़ों एवं बृद्धों को यथोचित सम्मान प्राप्त नहीं है। कॉलेजों का खुला वातावरण युवाओं को कभी-कभी अपराध एवं पतन की ओर धकेल देता है। कामकाजी महिलाओं पर दुहरा बोझ पड़ता है। फिजुल खर्चे, भोगवादी संस्कृति एवं नई विलासिता पूर्ण साम्रगी भी समस्याए उत्पन्न करती है। इन सबके विश्लेषण एवं समाधान पर गहन विचार विमर्श कर समाधान निकालना चाहिए। आज बालकों में संस्कार नहीं है ऐसा भ्रमक वातावरण बनाया जा रहा है जबकि उन्हें संस्कारित करने की जिम्मेदारी हमारी है यदि कोई भी परिवार टूटता है और बच्चा असंस्कारित होकर समाज और देश को तोड़ने जैसा कुत्सित कर्म करता है तो यह जिम्मेदारी परिवार के मुखिया की है। बालक अपने जन्म के साथ अपनी प्रकृति लेकर आता है। अत: उसका अध्ययन कर उसमें समाज के लिए उपयोगी संस्कारों का संवद्र्धन करना मुखिया का कार्य है स्वतंत्रता के बाद का कालखण्ड व्यक्तिवादी सोच कर रहा है अत:भारतीय संस्कृति को विस्मरण कर बैठे और परिवार की नहीं टूटे अपितु समाज की स्थिति भी दयनीय हो गई है। इसी कारण हम अपने सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों से दूर होते चले गए। आज जब परिवारों का संकट सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों के समझ उपस्थिति हो चला है अत: इस विषय पर व्यापक चिन्तन की आवश्यकता है।
वर्तमान परिवेश से दुखी :-
इन दिनों कुछ ऐसा ही हुआ है कि अध्यात्मिक आस्थाओं से विरत होकर मनुष्य संकीर्ण—स्वार्थो की कीचड़ में फसा पड़ा है। बाहर से कोई आदर्शवाद की बात भले कहता दीखे, भीतर से उसका क्रिया कलाप बहुत ओछा है एक दूसरे में यह प्रवृत्ति छूत की बीमारी की तरह बढ़ी और अनाचार का बोलबाला हुआ।परिणाम सामने है रोग, शोक, कलह, क्लेश, पाप, अपराध , शोषण अपहरण, छल प्रपंच की गतिविधियाँ बढ़ रही है और इन परिस्थितियों को बदलने एवं सुधारने की आवश्यकता है। मानव को प्यार करने वाले हर सजग एवं विवेकवान व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह समय की समस्याओं को समझे और व्यक्ति एवं समाज को अवनति से रोक, प्रगति के लिए जो सम्भव हो सके वह करें। विचार क्रान्ति अभियान एवं युग निर्माण योजना सजग आत्माओं की एक ऐसी ही क्रमबद्ध विचारणा तथा कार्य पद्वति है जिसके आधार पर वर्तमान शोक—संताप भरी परिस्थितियाँ बदला जाना सम्भव है।
वर्तमान समय में समाधान व निवारण:-
आज के आधुनिक समय में जहाँ चारो तरफ फैशन और पाश्चात्य संस्कृति का दौर फैल रहा हैं जिस कारण आज की युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति में इस तरह रंग चुकी हैं कि वह आध्यात्मिक ज्ञान से पूरी तरह अपरिचित हैं और इसी कारण समाज में भिन्न-भिन्न प्रकार की बुराइयाँ पनपने लगी हैं लेकिन दूसरी तरफ एकमात्र तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी ने अपने अनमोल शास्त्र अनुकूल सत्य ज्ञान से विश्व में फैली सर्व बुराईयों को जड़ से खत्म करने की मुहिम छेड़ी हैं जिसे लाखों लोगों ने अपनाकर सभी बुराईयों को छोड़कर एक स्वच्छ समाज तैयार करने का संकल्प लिया है जिसका श्रेय संत रामपाल जी महाराज जी द्वारा बताये अनमोल शास्त्र अनुकूल प्रमाणित सत्यज्ञान को जाता हैं।।
सुत दारा अरु लक्ष्मी पापी घर भी होय ।
संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोय ।।
तुलसीदास जी ने कहा कि पुत्र,सुंदर पत्नी और धन सम्पति यह तो पापी मनुष्य के पास भी हो सकती है परन्तु संत का समागम अर्थात संत का संग और प्रभु की कथा यानी हरि चर्चा यह दोनों ही इस भौतिक जगत में दुर्लभ है।
पूर्ण संत के सत्संग सुनने से संस्कारवान, चरित्र व स्वच्छ समाज व देश का निर्माण होता है पूर्ण गुरु के सत्संग सुनने से दुख दूर होते हैं और गृह क्लेश समाप्त हो जाते है और जीवन का उद्धार होता है।हम जितना अधिक पूर्ण संत का सत्संग सुनते है हमारे विकार उतने ही नष्ट होते है ।
अधिक जानकारी के लिए देखिए रोजाना शाम को साधना चैनल पर 7:30 से 8:30 तक संत रामपाल जी महाराज के अमृत वचन ।



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